वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी में आदिवासियों की संख्या 8.14 % है जो लगभग आठ करोड़ पैतालिस लाख दस हजार है और देश के क्षेत्रफल का लगभग 15% भाग पर स्थापित है। तथ्य यह है कि आदिवासी लोगों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे उनकी सामाजिक, आर्थिक एवं कमजोर सहभागिता के संकेतकों से समझा जा सके कि क्या बिजली और पीने वाला पानी अथवा कृषि योग्य भूमि का उपयोग, मात्रृ एवं शिशु मृत्यु दर में आदिवासी समुदाय व सामान्य जनसंख्या मे काफी अंतराल है। आदिवासी जनसंख्या की 52 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है और कारण क्या है कि 54 प्रतिशत आदिवासियों के पास यातायात एवं दूर संचार के रुप में आर्थिक संपत्तियाँ उपयोग के लिए नहीं हैं।
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के आधार पर आजीविका सृजन गतिविधियों की आवश्यकता की जरुरत के संकेतकों को रेखांकित करते हैं, ताकि लाभदायक रोजगार के अवसरों को आदिवासी लोगों के दरवाजे पर लाया जा सके। ऐसी आजीविका की शुरुआत लगातार सुचारु तरीके से आवश्यक …गतिविधियाँ पैदा करने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए किया गया है। कल्याण मंत्रालय जो (अब जनजातीय कार्य मंत्रालय) है ने गैर इमारती लकड़ी उत्पाद के लिए विपणन विकास गतिविधि के क्रियान्वयन के लिए एक संस्था (एन.टी.एफ.पी.)की स्थापना की है, जिस पर आदिवासी लोग अपना अधिक समय खर्च करते हैं और इससे अपनी आय का प्रमुख हिस्सा प्राप्त करते हैं। आदिवासी उत्पादों के विपणन के क्रियान्वयन के लिए पेशेवर, लोकतांत्रिक एवं स्वायत तरीके से सामाजिक, आर्थिक विकास के जरिए आदिवासी समुदाय का हित हो सके, इस उद्देश्य के साथ, वर्ष 1987, में भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ मर्यादित (ट्राईफेड) की स्थापना की गई थी।
आदिवासी शिल्प और कला के व्यापक प्रसार के माध्यम से आदिवासी लोगों के आर्थिक विकास को तेज करने के उद्देश्य से, आदिवासी कलाकृतियों की दुकानों के अलावा ट्राईफेड ने "ट्राइब्स इंण्डिया" के शोरुमों की स्थापना संपूर्ण भारत में स्थापना की है। भारतीय आदिवासी अपनी जादुई अभिव्यक्ति के माध्यम से उत्पादित कला और शिल्प बस्तुओं का विपणन करते हैं और प्रदर्शन करते हैं।


